Wednesday, May 8, 2013

अतिथि तुम कब जाओगे....



चीनी सेना ने फिर की घुसपैठ की खबर दिखा-सुनाकर न्यूज चैनलों ने युद्ध का उन्माद सा खड़ा कर दिया। न्यूज चैनलों को देखकर एकबार को तो ऐसा लगा कि मानो बस आर-पार की स्थिति हो गई है।अब तो शमशीरें निकालने भर की देरी है। काफी देर तक घुसपैठ की खबरे सुन-सुनकर दिमाग झनझनाया तो टीवी बंद कर दी। थोड़ा सुकून मिला तो सोचा चलो फेसबुक से मुखातिब हो लिया जाए। फेसबुक खोलते ही पहला पोस्ट पढ़ने को मिला... हां, हम युद्ध के लिए तैयार हैं तो दूसरे पोस्ट में लिखा था कि ड्रैगन दिल्ली पहुंचने की तैयारी में और देश आईपीएल देखने में व्यस्त है। तीसरा पोस्ट तो रिपोतार्ज सा लगा। लिखा था ...वाकई आज कहीं चीख-पुकार नहीं है। हम आजाद है लेकिन हर तरफ ख़ामोशी है...सन्नाटा है...वीराना है...जो शायद इशारा कर रहा है आने वाले तूफ़ान का! यहां एक आदमी (सरबजीत) की मौत पर हल्ला मचा रहे हैं और वहां हजारों माताओं की कोख सूनी होगी...। चीनी सेना के कृत्य से जुड़े करीब सात-आठ पोस्ट नजरों से होकर गुजर गए। लगा जैसे युद्ध भड़काने का काम चीनी कम अपने ज्यादा कर रहे हैं। टिप्पणियां ऐसी जैसे सुरक्षा सलाहकार के पद पर आसीन हों। सालों से भारत-चीन संबंधों पर उनकी पैनी नजर रही है। 
अरे... हिंदुस्तानियों को मेहमान नवाजी की महान परंपरा विरासत में मिली है। मेहमान को भगवान का दर्जा दिया जाता है। ये हमारे पर्यटन विभाग की उपलब्धि ही तो है जो चीनी सेना तंबू गाड़े इंतजार कर रही है कि कब आमिर खान आकर कहेंगे अतिथि देवो भवः। ये और बात है कि बाल्यकाल से ही हमें वे मेहमान सदा प्रिय रहे जो आते समय चॉकलेट लाते थे और जाते समय घर वालों के मना करने पर भी दो-पांच रुपए हाथ में थमा जाते थे। ऐसी परिस्थिति में घर वालों के लिए वो देवता रहे हो या नहीं हमारे लिए तो तुल्य थे। बस यहीं पर ये चीनी मात खा गए... न तो ये चॉकलेट ले कर आए और न ही इनकी हालत दो-पांच रुपए थमाने भर की दिख रही है। ऐसे हालातों में माओ को दूर से ही राम-राम।

Thursday, March 21, 2013

तेरी दो टकिया दी नौकरी, मेरी लाखों की छुट्टी जाए...



कदमों की आहट होते ही मैं बिस्तर छोड़कर ऐसे उठ बैठा मानो रातभर का जागा हुआ हूं। सुबह के साढ़े सात बज चुके थे। पिता जी दूध लेकर वापस घर आ चुके थे। उन दिनों पिताजी का खौफ हम भाइयों पर इस कदर हुआ करता था कि हम नई नवेली बहू की तरह पिताजी से घबराएं एक कमरे से दूसरे में छटपटाते भागते फिरते थे। ये पिताजी के पदचापों का ही भय था जिसने सुबह की अलस्यी नींद से मुझे सीमा पर खड़े मुस्तैद जवान सा खड़ा कर दिया था। उठते ही नजरें राजई में कुछ ढूंढने लगी। कहां गया, रातभर में किधऱ खिसक गया, कोई उठा तो नहीं ले गया आदि सवाल मन में उठने लगे। मसला यह था कि स्कूल में सहपाठी ने बताया था कि प्याज के बड़े फायदे हैं। खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ ही यह शरीर के ताप को भी बढ़ाता है। इशारा समझते हुए मैं उसके बताए नुस्खे पर छुट्टी मारने की नियत से रात को बगल में अधकटा प्याज लगाकर सोया था। अब सुबह उठा हूं तो न तो कटा प्याज दिख रहा और न ही शरीर में ताप। ऐसा लगा मानो पिताजी के डर से दोनो ही रफूचक्कर हो गए। खैर उस दिन मैंने पेट दर्द का बहाना बनाकर छुट्टी तो मार ही ली।
इस बात को अब 13 वर्ष बीत चुके हैं। तब स्कूल से छुट्टी के लिए घरवालों के पापड़ बेलने पड़ते थे। वहीं अब ऑफिस में इसके लिए बंदर का नाच करना पड़ता है। प्राइवेट जॉब में एक दिन की छुट्टी मोहनी अप्सरा सी दिखती है। इसका एहसास मुझे अभी दो माह पूर्व ऑफिस से छुट्टी लेने की तिकड़म बैठाते समय हुआ। आलम यह है कि अधिकारी वर्ग ने छुट्टियां देने की मेरिट लिस्ट सी बना रखी है। इसमें गमी में जाने वालों को वरर्यिता क्रम में सबसे उपर रखा गया। आपने इस सर्वमान्य धर्मनिरपेक्षता का दांव लगाया नहीं कि कईयों की शादी में जाने की समाजवादी छुट्टियों की लंका लग जाती है। ऐसे में यदि आप अपनी शादी की छट्टी ले रहे हैं तो उसमें कटौती पक्की और सम्मिलत होने जा रहे हैं तो शायद निराशा ही हाथ लगे। वहीं, साम्यवादी छुट्टियां आज भी शोषण के खिलाफ सर्वहारा की लड़ाई लड़ रही हैं। वीकली ऑफ के नाम पर ये छुट्टियां छलावा मात्र रह गईं हैं। दूसरी ओर, तबियत नसाज होने पर डॉक्टर दर्शन को जाने वाली दक्षिण पंथी छुट्टियां बाजी मार जाती हैं। कई बार ऐसे रूढ़ीवादी छुट्टीधारक स्वास्थ्य प्रमाणपत्र की आड़ में सात-आठ दिनों का अनुष्ठान भी निपटा आते हैं। जबकि मैं मायावती की तरह सर्वसमाज को छुट्टी देने की मांग करते हुए मनुवादी अधिकारियों को कोसता रहता हूं। ऐसे में मन करता है कि कलम की नोक पर माओवादी छुट्टियों की प्राप्ति करूं और कह दूं यह रहा मेरा इस्तीफा। पर क्या करूं, फिलहाल मुझमें पनप रहे नक्सली छुट्टी प्रेमी को किसी अन्य समाचार पत्र का साथ और आश्वासन जो नहीं मिल रहा।