कदमों की आहट होते ही मैं बिस्तर छोड़कर ऐसे उठ बैठा मानो रातभर का
जागा हुआ हूं। सुबह के साढ़े सात बज चुके थे। पिता जी दूध लेकर वापस घर आ चुके थे।
उन दिनों पिताजी का खौफ हम भाइयों पर इस कदर हुआ करता था कि हम नई नवेली बहू की
तरह पिताजी से घबराएं एक कमरे से दूसरे में छटपटाते भागते फिरते थे। ये पिताजी के
पदचापों का ही भय था जिसने सुबह की अलस्यी नींद से मुझे सीमा पर खड़े मुस्तैद जवान
सा खड़ा कर दिया था। उठते ही नजरें राजई में कुछ ढूंढने लगी। कहां गया, रातभर में किधऱ
खिसक गया, कोई उठा तो नहीं ले गया आदि सवाल मन में उठने लगे। मसला यह था कि स्कूल
में सहपाठी ने बताया था कि प्याज के बड़े फायदे हैं। खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ
ही यह शरीर के ताप को भी बढ़ाता है। इशारा समझते हुए मैं उसके बताए नुस्खे पर
छुट्टी मारने की नियत से रात को बगल में अधकटा प्याज लगाकर सोया था। अब सुबह उठा
हूं तो न तो कटा प्याज दिख रहा और न ही शरीर में ताप। ऐसा लगा मानो पिताजी के डर
से दोनो ही रफूचक्कर हो गए। खैर उस दिन मैंने पेट दर्द का बहाना बनाकर छुट्टी तो
मार ही ली।
इस बात को अब 13 वर्ष बीत चुके हैं। तब स्कूल से
छुट्टी के लिए घरवालों के पापड़ बेलने पड़ते थे। वहीं अब ऑफिस में इसके लिए बंदर
का नाच करना पड़ता है। प्राइवेट जॉब में एक दिन की छुट्टी मोहनी अप्सरा सी दिखती
है। इसका एहसास मुझे अभी दो माह पूर्व ऑफिस से छुट्टी लेने की तिकड़म बैठाते समय
हुआ। आलम यह है कि अधिकारी वर्ग ने छुट्टियां देने की मेरिट लिस्ट सी बना रखी है। इसमें
गमी में जाने वालों को वरर्यिता क्रम में सबसे उपर रखा गया। आपने इस सर्वमान्य
धर्मनिरपेक्षता का दांव लगाया नहीं कि कईयों की शादी में जाने की समाजवादी
छुट्टियों की लंका लग जाती है। ऐसे में यदि आप अपनी शादी की छट्टी ले रहे हैं तो
उसमें कटौती पक्की और सम्मिलत होने जा रहे हैं तो शायद निराशा ही हाथ लगे। वहीं,
साम्यवादी छुट्टियां आज भी शोषण के खिलाफ सर्वहारा की लड़ाई लड़ रही हैं। वीकली ऑफ
के नाम पर ये छुट्टियां छलावा मात्र रह गईं हैं। दूसरी ओर, तबियत नसाज होने पर
डॉक्टर दर्शन को जाने वाली दक्षिण पंथी छुट्टियां बाजी मार जाती हैं। कई बार ऐसे रूढ़ीवादी
छुट्टीधारक स्वास्थ्य प्रमाणपत्र की आड़ में सात-आठ दिनों का अनुष्ठान भी निपटा
आते हैं। जबकि मैं मायावती की तरह सर्वसमाज को छुट्टी देने की मांग करते हुए
मनुवादी अधिकारियों को कोसता रहता हूं। ऐसे में मन करता है कि कलम की नोक पर माओवादी
छुट्टियों की प्राप्ति करूं और कह दूं यह रहा मेरा इस्तीफा। पर क्या करूं, फिलहाल
मुझमें पनप रहे नक्सली छुट्टी प्रेमी को किसी अन्य समाचार पत्र का साथ और आश्वासन जो नहीं मिल रहा।

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