मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा...
अभी तक डूब के सुनते थे किस्सा मोहब्बत का,
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा।
डॉ. कुमार विश्वास की ये पंक्तियां भारतीय परिदृश्य में फिलहाल बिल्कुल सटीक बैठ रही हैं। मध्यकाल की जिन कुरीतियों को खत्म करने की कसमें आज खाई जाती हैं। उन पर बड़ी-बड़ी बातें करने में अधिकांश भारतीय मानस संकोच नहीं करता और गाहे-बगाहे इन परिचर्चाओं में खुद के आधुनिक होने का दावा भी करता है। लेकिन, जब वास्तविकता में कोई इन कुरीतियों पर प्रहार करता है तो भारतीय मानसिकता सामाजिक तानेबाने की चादर ओढ़कर विरोध में उतर आती है। एेसी ही परिस्थितियां हाल में प्रदर्शित फिल्म पीके के परिपेक्ष्य में देखने को मिलीं। पाखंड का विरोध करने करने के बजाए लोगों ने धर्म की आड़ लेकर फिल्म का विरोध करना शुरू कर दिया।
मध्यकाल में महाकवि कबीर दास ने भी धार्मिक अंधविश्वासों पर कुठाराघात किया था। कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाए, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय... या फिर, पाथर पूजे हरि मिलें तो मैं पूजूं पहार, ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार। उन्होंने अपनी बातें समाज में बेलाग तरीके से रखीं। वे हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय पर प्रहार करने से नहीं चूके, लेकिन तत्कालीन समाज में उनका इस कदर विरोध नहीं किया होगा जैसा आधुनिक काल में फिल्म पीके का किया जा रहा है। जबकि आज का समाज खुद को कहीं अधिक आजाद ख्याल होने का दावा करता है। फिल्म का विरोध करने वाले इस बात पर गौर क्यों नहीं करते कि फिल्म जब बनी तो उसके प्रदर्शित होने की सारी कानून सम्मत विधियों को पूरा किया गया होगा। फिल्म सेंसर बोर्ड के पास गई होगी। यदि ये भी मान लिया जाए कि बोर्ड ने अपना काम सही से नहीं किया तो इसके निपटान के लिए भारतीय अदालतें हैं। किसी का विरोध करना गलत नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन विरोध का भी तरीका होता है। क्या यह ज्यादा उचित नहीं होता कि इसका विरोध शांतिपूर्वक और संविधान सम्मत तरीकाें से किया जाता। यह कैसा आधुनिकता का ढकोसला है जो एक तरफ तालिबान के रवैये की निंदा करता है तो दूसरी तरफ अपने परिपेक्ष्य में दबे पांव उसी परपाटी पर हामी भर देता है। यह दोहरी मानसिकता देश के विकास को जकड़ रही है। विरोध के तरीके पर सवाल उठना लाजिमी है। यह कृत्य विरोध की आड़ में पाखंड का प्रदर्शन ज्यादा लगता है। भारतीय समाज पाठ्य पुस्तकाें में कबीर को पढ़ना तो स्वीकार करता है, लेकिन उनकी बाताें को जीवन में उतारना उसे अखरता है।
फिल्म पीके एक तीखा व्यंग है। लोकतंत्र में किसी का विरोध करने और पाखंड को उजागर करने के लिए व्यंग का उपयोग जायज है। विरोध करने वालाें को समझना चाहिए कि अपने विश्ववासों की रक्षा के लिए दूसरों के विचारों की अभिव्यक्ति पर आक्रमण नहीं किया जा सकता। उन्हें यह इजाजत दी भी नहीं जानी चाहिए। विरोधियाें को यह सोचना चाहिए कि फिल्म धर्म पर नहीं पाखंड पर चोट करती है। इसके लिए फिल्म की टीम का विरोध नहीं बल्कि उनकाे सराहा जाना चाहिए। आखिरकार इतने संवेदनशील मुद्दे को सिनेमा की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए फिल्म की टीम का प्रयास कबिलेतारीफ जो है।




