Wednesday, December 31, 2014

मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा...


अभी तक डूब के सुनते थे किस्सा मोहब्बत का,
मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा।
डॉ. कुमार विश्वास की ये पंक्तियां भारतीय परिदृश्य में फिलहाल बिल्कुल सटीक बैठ रही हैं। मध्यकाल की जिन कुरीतियों को खत्म करने की कसमें आज खाई जाती हैं। उन पर बड़ी-बड़ी बातें करने में अधिकांश भारतीय मानस संकोच नहीं करता और गाहे-बगाहे इन परिचर्चाओं में खुद के आधुनिक होने का दावा भी करता है। लेकिन, जब वास्तविकता में कोई इन कुरीतियों पर प्रहार करता है तो भारतीय मानसिकता सामाजिक तानेबाने की चादर ओढ़कर विरोध में उतर आती है। एेसी ही परिस्थितियां हाल  में प्रदर्शित फिल्म पीके के परिपेक्ष्य में देखने को मिलीं। पाखंड का विरोध करने करने के बजाए लोगों ने धर्म की आड़ लेकर फिल्म का विरोध करना शुरू कर दिया।
मध्यकाल में महाकवि कबीर दास ने भी धार्मिक अंधविश्वासों पर कुठाराघात किया था। कांकर पाथर जोड़ के मस्जिद लई बनाए, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय... या फिर, पाथर पूजे हरि मिलें तो मैं पूजूं पहार, ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार। उन्होंने अपनी बातें समाज में बेलाग तरीके से रखीं। वे हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय पर प्रहार करने से नहीं चूके, लेकिन तत्कालीन समाज में उनका इस कदर विरोध नहीं किया होगा जैसा आधुनिक काल में फिल्म पीके का किया जा रहा है। जबकि आज का समाज खुद को कहीं अधिक आजाद ख्याल होने का दावा करता है। फिल्म का विरोध करने वाले इस बात पर गौर क्यों नहीं करते कि फिल्म जब बनी तो उसके प्रदर्शित होने की सारी कानून सम्मत विधियों को पूरा किया गया होगा। फिल्म सेंसर बोर्ड के पास गई होगी। यदि ये भी मान लिया जाए कि बोर्ड ने अपना काम सही से नहीं किया तो इसके निपटान के लिए भारतीय अदालतें हैं। किसी का विरोध करना गलत नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन विरोध का भी तरीका होता है। क्या यह ज्यादा उचित नहीं होता कि इसका विरोध शांतिपूर्वक और संविधान सम्मत तरीकाें से किया जाता। यह कैसा आधुनिकता का ढकोसला है जो एक तरफ तालिबान के रवैये की निंदा करता है तो दूसरी तरफ अपने परिपेक्ष्य में दबे पांव उसी परपाटी पर हामी भर देता है।  यह दोहरी मानसिकता देश के विकास को जकड़ रही है।  विरोध के तरीके पर सवाल उठना लाजिमी है। यह कृत्य विरोध की आड़ में पाखंड का प्रदर्शन ज्यादा लगता है। भारतीय समाज पाठ्य पुस्तकाें में कबीर को पढ़ना तो स्वीकार करता है, लेकिन उनकी बाताें को जीवन में उतारना उसे अखरता है।
फिल्म पीके एक तीखा व्यंग है। लोकतंत्र में किसी का विरोध करने और पाखंड को उजागर करने के लिए व्यंग का उपयोग जायज है। विरोध करने वालाें को समझना चाहिए कि अपने विश्ववासों की रक्षा के लिए दूसरों के विचारों की अभिव्यक्ति पर आक्रमण नहीं किया जा सकता। उन्हें यह इजाजत दी भी नहीं जानी चाहिए। विरोधियाें को यह सोचना चाहिए कि फिल्म धर्म पर नहीं पाखंड पर चोट करती है। इसके लिए फिल्म की टीम का विरोध नहीं बल्कि उनकाे सराहा जाना चाहिए। आखिरकार इतने संवेदनशील मुद्दे को सिनेमा की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए फिल्म की टीम का प्रयास कबिलेतारीफ जो है।

Friday, March 21, 2014

ढोंढूढूढूढूढू.... जस्ट चिल!


ढोंढू - का बे सन्नाटा, का टुकुर-टुकुर देख रहे हो।
सन्नाटा- अबे इ देखो, सर्वे बता रहा है कि कांग्रेस कई बिलांद छोटी हो गई। अब न बनने की इनकी सरकार। करप्शन के पेबंदों ने ऐसी-तैसी कर दी।

ढोंढू - अबे लपड़झंडू... पेंट जितनी भी बिलांद छोटी हो जाए भाजपाई हाफ-पेंट से तो बड़ी ही रहेगी।
सन्नाटा - ढोंढूवा... तू समझ नहीं रहा बे। अब समय बदल रहा है। पेंट नहीं अब जीन्स का जमाना है।

ढोंढू - बड़े आए जीन्स वाले... देश धोती छोड़कर पूरी तरह पेंट वाला भी नहीं हो पाया और ये जीन्स ले आए। अबे दिल्ली की बात और है.... बुध्दजीवी समझते हो...

सन्नाटा - हां भईया.... वहीं न जो बुध ग्रह पर रहते हैं
ढोंढू - सही कह रहे हो बेटा... वो सही मै बुध पर ही रहते हैं.... तभी तो उनकी प्रोब्लम्स अलग हैं बे.... अब वहां तू जीन्स की बात करे तो सही है पर बेटा दिल्ली के आगे देश आज भी धोती वालों का ही है और रही बात जीन्स की तो एक बात बता दूं... जीन्स भी तभी मजा देवे है जब पुरानी हो जावे है।

सन्नाटा - अच्छा तो महाराज बताओ इस बार चुनावी बिसात क्या बैठेगी।
ढोंढू - वेल... एक्चुली... आई डोन्ट नो....
सन्नाटा - जब मालूम नहीं तो काहे बकर-बकर कर रहे हो... बड़े आए सोलह दूनी आठ।

ढोंढू - अबे देखो... ज्यादा फैटम मत बनो, भावनाओं को समझों.... वो गाना है न.... पुरानी जीन्स और वो गिटार... मोहल्ले की वो छत और मेरे यार..... तो समझे बेटा सन्नाटा बस बातें... बातें ही रह जाती हैं... और सरकारें... सरकारें बन जाती हैं........  जाओ कुकर सीटी दे रहा है। गरमा-गरम खाना खिलाओ....।
(सभी पात्र काल्पनिक हैं और इनका किसी ........वगैराह-वगैराह......)

to be continued....

Wednesday, May 8, 2013

अतिथि तुम कब जाओगे....



चीनी सेना ने फिर की घुसपैठ की खबर दिखा-सुनाकर न्यूज चैनलों ने युद्ध का उन्माद सा खड़ा कर दिया। न्यूज चैनलों को देखकर एकबार को तो ऐसा लगा कि मानो बस आर-पार की स्थिति हो गई है।अब तो शमशीरें निकालने भर की देरी है। काफी देर तक घुसपैठ की खबरे सुन-सुनकर दिमाग झनझनाया तो टीवी बंद कर दी। थोड़ा सुकून मिला तो सोचा चलो फेसबुक से मुखातिब हो लिया जाए। फेसबुक खोलते ही पहला पोस्ट पढ़ने को मिला... हां, हम युद्ध के लिए तैयार हैं तो दूसरे पोस्ट में लिखा था कि ड्रैगन दिल्ली पहुंचने की तैयारी में और देश आईपीएल देखने में व्यस्त है। तीसरा पोस्ट तो रिपोतार्ज सा लगा। लिखा था ...वाकई आज कहीं चीख-पुकार नहीं है। हम आजाद है लेकिन हर तरफ ख़ामोशी है...सन्नाटा है...वीराना है...जो शायद इशारा कर रहा है आने वाले तूफ़ान का! यहां एक आदमी (सरबजीत) की मौत पर हल्ला मचा रहे हैं और वहां हजारों माताओं की कोख सूनी होगी...। चीनी सेना के कृत्य से जुड़े करीब सात-आठ पोस्ट नजरों से होकर गुजर गए। लगा जैसे युद्ध भड़काने का काम चीनी कम अपने ज्यादा कर रहे हैं। टिप्पणियां ऐसी जैसे सुरक्षा सलाहकार के पद पर आसीन हों। सालों से भारत-चीन संबंधों पर उनकी पैनी नजर रही है। 
अरे... हिंदुस्तानियों को मेहमान नवाजी की महान परंपरा विरासत में मिली है। मेहमान को भगवान का दर्जा दिया जाता है। ये हमारे पर्यटन विभाग की उपलब्धि ही तो है जो चीनी सेना तंबू गाड़े इंतजार कर रही है कि कब आमिर खान आकर कहेंगे अतिथि देवो भवः। ये और बात है कि बाल्यकाल से ही हमें वे मेहमान सदा प्रिय रहे जो आते समय चॉकलेट लाते थे और जाते समय घर वालों के मना करने पर भी दो-पांच रुपए हाथ में थमा जाते थे। ऐसी परिस्थिति में घर वालों के लिए वो देवता रहे हो या नहीं हमारे लिए तो तुल्य थे। बस यहीं पर ये चीनी मात खा गए... न तो ये चॉकलेट ले कर आए और न ही इनकी हालत दो-पांच रुपए थमाने भर की दिख रही है। ऐसे हालातों में माओ को दूर से ही राम-राम।

Thursday, March 21, 2013

तेरी दो टकिया दी नौकरी, मेरी लाखों की छुट्टी जाए...



कदमों की आहट होते ही मैं बिस्तर छोड़कर ऐसे उठ बैठा मानो रातभर का जागा हुआ हूं। सुबह के साढ़े सात बज चुके थे। पिता जी दूध लेकर वापस घर आ चुके थे। उन दिनों पिताजी का खौफ हम भाइयों पर इस कदर हुआ करता था कि हम नई नवेली बहू की तरह पिताजी से घबराएं एक कमरे से दूसरे में छटपटाते भागते फिरते थे। ये पिताजी के पदचापों का ही भय था जिसने सुबह की अलस्यी नींद से मुझे सीमा पर खड़े मुस्तैद जवान सा खड़ा कर दिया था। उठते ही नजरें राजई में कुछ ढूंढने लगी। कहां गया, रातभर में किधऱ खिसक गया, कोई उठा तो नहीं ले गया आदि सवाल मन में उठने लगे। मसला यह था कि स्कूल में सहपाठी ने बताया था कि प्याज के बड़े फायदे हैं। खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ ही यह शरीर के ताप को भी बढ़ाता है। इशारा समझते हुए मैं उसके बताए नुस्खे पर छुट्टी मारने की नियत से रात को बगल में अधकटा प्याज लगाकर सोया था। अब सुबह उठा हूं तो न तो कटा प्याज दिख रहा और न ही शरीर में ताप। ऐसा लगा मानो पिताजी के डर से दोनो ही रफूचक्कर हो गए। खैर उस दिन मैंने पेट दर्द का बहाना बनाकर छुट्टी तो मार ही ली।
इस बात को अब 13 वर्ष बीत चुके हैं। तब स्कूल से छुट्टी के लिए घरवालों के पापड़ बेलने पड़ते थे। वहीं अब ऑफिस में इसके लिए बंदर का नाच करना पड़ता है। प्राइवेट जॉब में एक दिन की छुट्टी मोहनी अप्सरा सी दिखती है। इसका एहसास मुझे अभी दो माह पूर्व ऑफिस से छुट्टी लेने की तिकड़म बैठाते समय हुआ। आलम यह है कि अधिकारी वर्ग ने छुट्टियां देने की मेरिट लिस्ट सी बना रखी है। इसमें गमी में जाने वालों को वरर्यिता क्रम में सबसे उपर रखा गया। आपने इस सर्वमान्य धर्मनिरपेक्षता का दांव लगाया नहीं कि कईयों की शादी में जाने की समाजवादी छुट्टियों की लंका लग जाती है। ऐसे में यदि आप अपनी शादी की छट्टी ले रहे हैं तो उसमें कटौती पक्की और सम्मिलत होने जा रहे हैं तो शायद निराशा ही हाथ लगे। वहीं, साम्यवादी छुट्टियां आज भी शोषण के खिलाफ सर्वहारा की लड़ाई लड़ रही हैं। वीकली ऑफ के नाम पर ये छुट्टियां छलावा मात्र रह गईं हैं। दूसरी ओर, तबियत नसाज होने पर डॉक्टर दर्शन को जाने वाली दक्षिण पंथी छुट्टियां बाजी मार जाती हैं। कई बार ऐसे रूढ़ीवादी छुट्टीधारक स्वास्थ्य प्रमाणपत्र की आड़ में सात-आठ दिनों का अनुष्ठान भी निपटा आते हैं। जबकि मैं मायावती की तरह सर्वसमाज को छुट्टी देने की मांग करते हुए मनुवादी अधिकारियों को कोसता रहता हूं। ऐसे में मन करता है कि कलम की नोक पर माओवादी छुट्टियों की प्राप्ति करूं और कह दूं यह रहा मेरा इस्तीफा। पर क्या करूं, फिलहाल मुझमें पनप रहे नक्सली छुट्टी प्रेमी को किसी अन्य समाचार पत्र का साथ और आश्वासन जो नहीं मिल रहा।

Saturday, October 27, 2012

उल्टा पड़ता सरकारी दांव




1870 में आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने देशद्रोह कानून को लागू किया। इग्लैण्ड में जुलाई 2009 में इस कानून को रद्द कर दिया गया। लेकिन, भारत में इसे अब भी ढोया जा रहा है। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि सरकारें इस कानून का उपयोग आंदोलनों को दबाने के लिए करती रही हैं। वहीं, बदलते परिवेश में सोशल नेटवर्क और संचार की बढ़ती पैंठ के चलते सरकार को इस कानून से फायदा कम घाटा ज्यादा उठाना पड़ रहा है। विनायक सेन, अरुंधती राय, प्रो. महापात्रा और असीम के मामलों में सरकार की किरकिरी होने पर उसे बैकफुट पर जाने को मजबूर होना पड़ा है।

सैडीशन लॉ यानि देशद्रोह कानून को किसी के खिलाफ तभी लागू किया जा सकता है, जब उसके कृत्य से व्यापक हिंसा भड़क उठी हो। लेकिन, असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी के मामले में यदि कुछ भड़का है तो वह नेताओं का अहम। संविधान की दुहाई देकर राष्ट्र चिन्ह्नों के सम्मान की आड़ में हुई गिरफ्तारी को कैसे तर्कसंगत माना जा सकता है, जब उसी संविधान में लोगों को मौलिक अधिकार के तहत विरोध करने का हक दिया गया हो। आखिरकार, इसका भी सम्मान होना चाहिए। कार्टून विरोध की कला मानी जाती है, इसे विद्रोह की कला कैसे माना जा सकता है। विगत अप्रैल में प. बंगाल के प्रोफेसर को इसलिए गिरफ्तार किया जाता है क्योंकि उसने मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का कार्टून बनाकर इंटरनेट पर प्रसारित किया था। इन दोनों ही मामलों में कार्टून सही है या गलत इस बात पर तो बहस की जा सकती है, लेकिन किसी की अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाना सही नहीं ठहराया जा सकता। असीम पर हुई पुलिसिया कार्रवाई ने अघोषित आपातकाल सी स्थिति पैदा कर दी है। मानों, जैसे देश में खबरों और कार्टूनों को सेंसर किया जा रहा है। ताजा प्रकरण में सरकार की कार्रवाई पर उंगली उठा रहा विपक्ष भी सरकार का प्रतिरूप ही है। दोनों में अंतर केवल सत्ताधारी और विपक्ष का है। इसकी बानगी मई में हुई घटना में देखी जा चुकी है, जब स्कूल पाठ्य पुस्तकों में दलित नेता बाबा साहेब अंबेडकर के कार्टून को लेकर विपक्षी दलों ने खूब हंगामा काटा था। अब वही विपक्ष कार्टूनिस्ट का पक्ष ले रहा है। यह मात्र ओछी राजनीति का परिचायक है।

आजादी से पूर्व 1897 में बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चला था। मुकदमे के दौरान तिलक ने कहा था कि मेरे ऊपर जो आरोप लगाए गए हैं वह ब्रिटिश सरकार द्वारा हैं या भारतीय जनता द्वारा। उनकी सजा मुकरर होने के बाद इन शब्दों का निहितार्थ समझा जा सका। भारतीयों के बीच तिलक सर्वमान्य नेता के तौर पर उभरे और उन्हे ‘लोकमान्य’ के तौर पर बुलाया जाने लगा। कुछ ऐसी ही प्रतिक्रियाएं असीम पर लगाए देशद्रोह के मामले में भी देखने को मिली। गिरफ्तारी के बाद वे किसी नेशनल हीरो की तरह भारतीय फलक पर यकायक चमक उठे।

सरकार द्वारा असीम की गिरफ्तारी को राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है। सरकार की मंशा को भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए जा रहे आंदोलन को कमजोर करने के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन, हुआ इसका उल्टा। असीम की गिरफ्तारी पर देश भर में जिस प्रकार की व्यापक प्रतिक्रियाएं देखने को मिली, उससे इंडिया अंगेस्ट करप्शन मूवमेंट को मजबूती ही मिली। आखिरकार उसे आंदोलन का नेतृत्व करने को एक नया चेहरा जो मिल गया।

Wednesday, July 20, 2011

लघु-समीक्षा

भारतीय दर्शक अब वयस्क हो चला है, A सार्टिफिकेट प्राप्त फिल्म डेली-बेली की सफलता से तो यही लगता है। आमिर खान ने फिर साबित कर दिया कि वे दर्शकों की नब्ज़ पर गहराई से पकड़ रखते हैं। पूरी फिल्म पर हॉलीवुड फिल्म अमेरिकन-पाई सीरीज की झलक दिखती है। कहा जा सकता है कि आमिर खान ने भारतीय दर्शकों को ध्यान में रखकर इण्डियन-पाई बनायी है। शायद इसीलिए सेक्स कॉमेडी के साथ कुछ बॉलीवुड मसालों का भी स्वाद देखने को मिलता है। पूरी फिल्म की खासियत विजय राज रहे। अदाकारी के मामले उनका जवाब नहीं। यह विजय राज की ही कुशल अदाकारी है कि उनके द्वारा बोले गए संवादों में प्रयोग किए गए अप्रिय शब्दों पर ख़ीज की जगह हंसी आती है।
        फिल्म पूर्णतः हॉलीवुड तर्ज पर बनी है। फिल्म की स्टोरी में रफ्तार रखने के साथ-साथ फिल्म की अवधि भी पौने दो घण्टे के आसपास रखी गयी है। गानों का अभाव है, जो फिल्म की  अवधि को सीमित करता है।      

Tuesday, July 19, 2011

चिल्ल-पो

अबे ज़ाहिल! तू काहे चिल्लाए जा रहा है बे। सरकार तेरी सुरक्षा को लेकर मरी जा रही है, करोड़ो रूपये पानी की तरह तेरी सुरक्षा को बहा रही है और एक तू है कि ज़रा सा धमाका हुआ नहीं कि लगा चिल्लाने। देर-सवेर तो होती ही रहती है पर सरकार चिन्तित है तेरी सुरक्षा के लिए। नालायक, फिर क्यों चिल्ला रहा है।
अरे चिल्लाना तो बाबा रामदेव और अन्ना ब्रिगेड को चाहिए। अच्छी खासी मेहनत पर इस आतंकी धमाके ने विस्फोट कर दिया। मुआ! सारी कवरेज बटोर ले गया। बाबा की तो महीने भर की कवायद धरी की धरी रह गयी। जान की बाजी लगायी, पुलिसिया डण्डों का सामना किया पर एक धमाके ने सारा खेल बिगाड़ दिया। पर तुझे क्या? तू तो बस लगा चिल्लाने।                          देख तेरी चिल्ल-पो ने राजनैतिक पार्टियों में कैसी हलचल पैदा कर दी? बयानबाज़ी की झड़ी सी लग गई। तेरी सुरक्षा को लेकर पार्टियां बेचैन हो उठी। अपने दूसरे बाबा (राहुल बाबा) तेरी सुरक्षा को लेकर परेशान हो उठे हैं। बेचारे कितने चिन्तित हैं, पर क्या करें, साला! एक प्रतिशत जो भारी पड़ रहा है उन पर, वर्ना 99 प्रतिशत तो तू सुरक्षित है ही। फिर क्यों शोर मचा रहा है? तू क्या चाहता है, तेरी सुरक्षा के लिए वे एस.पी.जी. लगवा दे। तेरी सुरक्षा का स्तर कितना ऊँचा है यह दिग्विजय सिंह से पूछ। अबे! यहां तू पाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा महफूस है तभी तो तू अभी तक जिंदा है। देख, तेरे जीवित रहने का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। आखिरकार पाकिस्तान के मुकाबले भारत में विस्फोट का रिकार्ड जो इन्होंने अच्छा बना रखा है। कम से कम उसका शुक्रिया तो अदा कर ज़ाहिल। लेकिन तू तब भी चिल्ला रहा है। छाती पीट रहा है। पर सुन, तेरी ही आस्तीन में सांप हैं। तेरे ही बन्धु इसके जिम्मेवार हैं। अरे भोले! राज ठाकरे ने कितना समझाया कि इन उत्तर भारतीयों से दूर रह, पर तू है कि मानता ही नहीं। अब भी समय है संभल जा। राज ठाकरे की न सही तो दिग्गी राजा की ही सुन ले। यही मान ले कि इन धमाको के पीछे हिन्दू संगठनों का हाथ है। तू मानता क्यों नहीं कि ये धमाका तेरे अपनो की ही देन है। यह तेरी ही गलती का दुष्परिणाम है और तू दूसरों पर चिल्ला-चिल्लाकर दोषारोपण कर रहा है। अरे! कम से कम धर्मनिरपेक्ष पुरोधा की तो सुन ले।  
मूर्ख, सरकार को कोस रहा है। बड़े जतन से तो सरकार बनायी है। वोट देने के समय तो बड़ा इतरा रहा था, होशियारी दिखा रहा था। तेरी होशियारी की ही देन है कि एक पार्टी की सरकार नहीं बन सकी। अब गठबंधन सरकार की अपनी कुछ मजबूरियां होती हैं। उन मजबूरियों का भुगतान कौन करेगा? मंत्री सरकार की सुरक्षा के लिए गठबंधन धर्म निभाएं कि तेरी सुरक्षा को दौड़े। अरे गधे! यह तो समझ, तेरी सुरक्षा की जवाबदेही मंत्री या मंत्रालय की नहीं गठबंधन में निहित पार्टियों की होती है। मैं पूछता हूं कि उचित-अनुचित, सुरक्षा-असुरक्षा का सवाल करने वाला तू कौन होता है? तू यह क्यों भूल रहा है कि तू चुनाव में अपना प्रतिनिधि चुन चुका है। फिर क्यों अपनी टांग अड़ा रहा है? अब बंद कर चिल्लाना। जाने ज़ाहिल कब समझेगा तू? 
तेरी आए दिन की चिल्ल-पो ने राजनैतिक पार्टियों के भोपू चालू कर दिए। बयानों की ऐसी बयार चल पड़ी है कि अब तेरी आवाज ही दब सी गयी है। तेरी चिल्ल-पो से बड़ी चिल्ल-पो शुरू हो चुकी है। तो बेटा, अब तेरी चिल्ल-पो किसी काम की नहीं रही। सुन, नक्कारे में तूती नहीं बजायी जाती। अब चिल्लाता रह।