Friday, March 21, 2014

ढोंढूढूढूढूढू.... जस्ट चिल!


ढोंढू - का बे सन्नाटा, का टुकुर-टुकुर देख रहे हो।
सन्नाटा- अबे इ देखो, सर्वे बता रहा है कि कांग्रेस कई बिलांद छोटी हो गई। अब न बनने की इनकी सरकार। करप्शन के पेबंदों ने ऐसी-तैसी कर दी।

ढोंढू - अबे लपड़झंडू... पेंट जितनी भी बिलांद छोटी हो जाए भाजपाई हाफ-पेंट से तो बड़ी ही रहेगी।
सन्नाटा - ढोंढूवा... तू समझ नहीं रहा बे। अब समय बदल रहा है। पेंट नहीं अब जीन्स का जमाना है।

ढोंढू - बड़े आए जीन्स वाले... देश धोती छोड़कर पूरी तरह पेंट वाला भी नहीं हो पाया और ये जीन्स ले आए। अबे दिल्ली की बात और है.... बुध्दजीवी समझते हो...

सन्नाटा - हां भईया.... वहीं न जो बुध ग्रह पर रहते हैं
ढोंढू - सही कह रहे हो बेटा... वो सही मै बुध पर ही रहते हैं.... तभी तो उनकी प्रोब्लम्स अलग हैं बे.... अब वहां तू जीन्स की बात करे तो सही है पर बेटा दिल्ली के आगे देश आज भी धोती वालों का ही है और रही बात जीन्स की तो एक बात बता दूं... जीन्स भी तभी मजा देवे है जब पुरानी हो जावे है।

सन्नाटा - अच्छा तो महाराज बताओ इस बार चुनावी बिसात क्या बैठेगी।
ढोंढू - वेल... एक्चुली... आई डोन्ट नो....
सन्नाटा - जब मालूम नहीं तो काहे बकर-बकर कर रहे हो... बड़े आए सोलह दूनी आठ।

ढोंढू - अबे देखो... ज्यादा फैटम मत बनो, भावनाओं को समझों.... वो गाना है न.... पुरानी जीन्स और वो गिटार... मोहल्ले की वो छत और मेरे यार..... तो समझे बेटा सन्नाटा बस बातें... बातें ही रह जाती हैं... और सरकारें... सरकारें बन जाती हैं........  जाओ कुकर सीटी दे रहा है। गरमा-गरम खाना खिलाओ....।
(सभी पात्र काल्पनिक हैं और इनका किसी ........वगैराह-वगैराह......)

to be continued....

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