1870 में आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने देशद्रोह कानून को लागू किया। इग्लैण्ड में जुलाई 2009 में इस कानून को रद्द कर दिया गया। लेकिन, भारत में इसे अब भी ढोया जा रहा है। आरोप लगाए जाते रहे हैं कि सरकारें इस कानून का उपयोग आंदोलनों को दबाने के लिए करती रही हैं। वहीं, बदलते परिवेश में सोशल नेटवर्क और संचार की बढ़ती पैंठ के चलते सरकार को इस कानून से फायदा कम घाटा ज्यादा उठाना पड़ रहा है। विनायक सेन, अरुंधती राय, प्रो. महापात्रा और असीम के मामलों में सरकार की किरकिरी होने पर उसे बैकफुट पर जाने को मजबूर होना पड़ा है।
सैडीशन लॉ यानि देशद्रोह कानून को किसी के खिलाफ तभी लागू किया जा सकता है, जब उसके कृत्य से व्यापक हिंसा भड़क उठी हो। लेकिन, असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी के मामले में यदि कुछ भड़का है तो वह नेताओं का अहम। संविधान की दुहाई देकर राष्ट्र चिन्ह्नों के सम्मान की आड़ में हुई गिरफ्तारी को कैसे तर्कसंगत माना जा सकता है, जब उसी संविधान में लोगों को मौलिक अधिकार के तहत विरोध करने का हक दिया गया हो। आखिरकार, इसका भी सम्मान होना चाहिए। कार्टून विरोध की कला मानी जाती है, इसे विद्रोह की कला कैसे माना जा सकता है। विगत अप्रैल में प. बंगाल के प्रोफेसर को इसलिए गिरफ्तार किया जाता है क्योंकि उसने मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का कार्टून बनाकर इंटरनेट पर प्रसारित किया था। इन दोनों ही मामलों में कार्टून सही है या गलत इस बात पर तो बहस की जा सकती है, लेकिन किसी की अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाना सही नहीं ठहराया जा सकता। असीम पर हुई पुलिसिया कार्रवाई ने अघोषित आपातकाल सी स्थिति पैदा कर दी है। मानों, जैसे देश में खबरों और कार्टूनों को सेंसर किया जा रहा है। ताजा प्रकरण में सरकार की कार्रवाई पर उंगली उठा रहा विपक्ष भी सरकार का प्रतिरूप ही है। दोनों में अंतर केवल सत्ताधारी और विपक्ष का है। इसकी बानगी मई में हुई घटना में देखी जा चुकी है, जब स्कूल पाठ्य पुस्तकों में दलित नेता बाबा साहेब अंबेडकर के कार्टून को लेकर विपक्षी दलों ने खूब हंगामा काटा था। अब वही विपक्ष कार्टूनिस्ट का पक्ष ले रहा है। यह मात्र ओछी राजनीति का परिचायक है।
आजादी से पूर्व 1897 में बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चला था। मुकदमे के दौरान तिलक ने कहा था कि मेरे ऊपर जो आरोप लगाए गए हैं वह ब्रिटिश सरकार द्वारा हैं या भारतीय जनता द्वारा। उनकी सजा मुकरर होने के बाद इन शब्दों का निहितार्थ समझा जा सका। भारतीयों के बीच तिलक सर्वमान्य नेता के तौर पर उभरे और उन्हे ‘लोकमान्य’ के तौर पर बुलाया जाने लगा। कुछ ऐसी ही प्रतिक्रियाएं असीम पर लगाए देशद्रोह के मामले में भी देखने को मिली। गिरफ्तारी के बाद वे किसी नेशनल हीरो की तरह भारतीय फलक पर यकायक चमक उठे।
सरकार द्वारा असीम की गिरफ्तारी को राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है। सरकार की मंशा को भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए जा रहे आंदोलन को कमजोर करने के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन, हुआ इसका उल्टा। असीम की गिरफ्तारी पर देश भर में जिस प्रकार की व्यापक प्रतिक्रियाएं देखने को मिली, उससे इंडिया अंगेस्ट करप्शन मूवमेंट को मजबूती ही मिली। आखिरकार उसे आंदोलन का नेतृत्व करने को एक नया चेहरा जो मिल गया।

No comments:
Post a Comment